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उत्तराखंड- पलायन एक समस्या

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         हमारा उत्तराखंड- पलायन एक समस्या       दोस्तों यह लेख आँकड़ों और सुनी-सुनाई बातों पर आधारित नहीं हैं। इसे मैने अपने द्वारा किए गए कार्यो और अनुभवों के आधार पर लिखा है। हमारे द्वारा किए गये सकारात्मक कार्यो की फोटोज भी सेयर कर रहा हुँ।  अतः आपसे विनम्र निवेदन है कि पूरा पढकर इस विषय पर अपनी राय प्रस्तुत करे।           पिछले कुछ वर्षों में एक नया फैशन आ गया अपने उत्तराखंड में, परिवार सहित शहरों को भागने का फैशन। वर्तमान समय में शायद ही कोई ऐसा गाँव अब उत्तराखंड मे बचा हो जहाँ से कुछ परिवार शहर में न बस गए हों। लगभग सभी गाँवों से पलायन हो रहा है। कहीं कम तो कही ज्यादा, पर शहर की ओर भागने की होड़ सभी जगह लगी हुई है। आए दिन समाचार पत्रों, न्यूज चैनलों और सोशियल साइट्स पर उत्तराखंड के गांवों से पलायन पर चर्चाएं की जा रही हैं। और जो आँकड़े बताए जा रहे हैं। उन आँकड़ों के अनुसार उत्तराखंड से पलायन के बहुत सारे कारण बताए गए हैं, जिनमें से तीन कारणों को उत्तराखंड के गांवों से पलायन के प्रमुख कारणों मे गिना जा रहा ह...

पहल

एक मित्र से एक दिन बात चल रही थी। तो बातों बातों में ही उसने बताया कि वह डॉक्टर बनना चाहता है। मैंने पूछा कि " कि तुम डॉक्टर क्यों बनना चाहतें मित्र बोला - " मुझे लोगों को दिखाना है डॉक्टर बनकर। जो लोग मेरी आलोचना करते है उनका मुँह बन्द करना है।" ऐसा ही एक और महिला मित्र ने कहा - " कि  देखती हूँ कब तक बने फिरते हो समाज सुधारक।" यानी हम तो कुछ करने से रहे! लेकिन जो कुछ सुधार कर रहा है या करना चाहता है उसे भी सहयोग करने के बजाय उसकी आलोचना। हम कहते फिर रहे है कि सुधार नही हो रहा अरे कैसे होगा। जब डॉक्टर, टीचर, इंजीनीयर, नेता, अपने फायदे और दूसरों को दिखाने के लिए ही काम करने लगें। और आधे से अधिक जनता भी इसी मानसिकता से घिरी हुई है - " देखते है क्या करता है ये। कुछ मुर्ख लोगों ने अभी एक और शब्द सीख लिए है अगर कोई अपने धर्म, सरकार या देश की बुराइयों को सामने लाये। तो उसे सेक्युलर बोल दो। लेकिन उन्हें इस शब्द की परिभाषा तक नही पता। अंग्रेज हमे आईना (हमारी कमियां दिखाना) बेच कर चले गए और हम आज भी अंधे बने फिर रहे है। और उनका आईना हमारे लिए किसी काम का नह...