पहल

एक मित्र से एक दिन बात चल रही थी। तो बातों बातों में ही उसने बताया कि वह डॉक्टर बनना चाहता है।
मैंने पूछा कि " कि तुम डॉक्टर क्यों बनना चाहतें मित्र बोला - " मुझे लोगों को दिखाना है डॉक्टर बनकर। जो लोग मेरी आलोचना करते है उनका मुँह बन्द करना है।"
ऐसा ही एक और महिला मित्र ने कहा - " कि  देखती हूँ कब तक बने फिरते हो समाज सुधारक।" यानी हम तो कुछ करने से रहे! लेकिन जो कुछ सुधार कर रहा है या करना चाहता है उसे भी सहयोग करने के बजाय उसकी आलोचना।
हम कहते फिर रहे है कि सुधार नही हो रहा अरे कैसे होगा। जब डॉक्टर, टीचर, इंजीनीयर, नेता, अपने फायदे और दूसरों को दिखाने के लिए ही काम करने लगें। और आधे से अधिक जनता भी इसी मानसिकता से घिरी हुई है - " देखते है क्या करता है ये।
कुछ मुर्ख लोगों ने अभी एक और शब्द सीख लिए है अगर कोई अपने धर्म, सरकार या देश की बुराइयों को सामने लाये। तो उसे सेक्युलर बोल दो।
लेकिन उन्हें इस शब्द की परिभाषा तक नही पता।
अंग्रेज हमे आईना (हमारी कमियां दिखाना) बेच कर चले गए और हम आज भी अंधे बने फिर रहे है। और उनका आईना हमारे लिए किसी काम का नही।  उस आईने में हम अपना चेहरा नही देख पा रहे क्योंकि अंधे के लिए आईने का कोई महत्व नही।
तो आइए पहल करें समाज के लिए अपनी-अपनी भूमिका निभाने की। किसी को दिखाने के लिए कुछ बनने से कोई लाभ नही। जिससे जितना हो सके अच्छे कार्य करें। कुछ नही भी कर सकते तो जो लोग अच्छा कर रहे है उनके साथ खड़े हो जाएं।
‌    लॉजिकल थिंकर- विनोद फल्याटी

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