उत्तराखंड- पलायन एक समस्या

        हमारा उत्तराखंड- पलायन एक समस्या
     दोस्तों यह लेख आँकड़ों और सुनी-सुनाई बातों पर आधारित नहीं हैं। इसे मैने अपने द्वारा किए गए कार्यो और अनुभवों के आधार पर लिखा है। हमारे द्वारा किए गये सकारात्मक कार्यो की फोटोज भी सेयर कर रहा हुँ।  अतः आपसे विनम्र निवेदन है कि पूरा पढकर इस विषय पर अपनी राय प्रस्तुत करे। 

         पिछले कुछ वर्षों में एक नया फैशन आ गया अपने उत्तराखंड में, परिवार सहित शहरों को भागने का फैशन। वर्तमान समय में शायद ही कोई ऐसा गाँव अब उत्तराखंड मे बचा हो जहाँ से कुछ परिवार शहर में न बस गए हों। लगभग सभी गाँवों से पलायन हो रहा है। कहीं कम तो कही ज्यादा, पर शहर की ओर भागने की होड़ सभी जगह लगी हुई है। आए दिन समाचार पत्रों, न्यूज चैनलों और सोशियल साइट्स पर उत्तराखंड के गांवों से पलायन पर चर्चाएं की जा रही हैं। और जो आँकड़े बताए जा रहे हैं। उन आँकड़ों के अनुसार उत्तराखंड से पलायन के बहुत सारे कारण बताए गए हैं, जिनमें से तीन कारणों को उत्तराखंड के गांवों से पलायन के प्रमुख कारणों मे गिना जा रहा है।
    1- शिक्षा,
    2- स्वास्थ
    3- रोजगार
       अब आइए यह जानने का प्रयास करते हैं कि आँकड़ों में और हकीकत में कितना अंतर है। क्योंकि मैं प्रारम्भ से ही गाँव में ही रहा हुँ, केवल आवश्यक कार्यो, पढ़ाई और घूमने के लिए ही शहर गया हुॅ। और शहर में इतना तो रहा ही हुँ कि हर के माहौल और जिन्दगी को समझ पाऊं, विशेष तौर पर भारत की राजधानी दिल्ली की लाइफ, जहां पर समय बिताने का अनुभव लगभग हर भारतीय को होता है, मुझे भी वहां पर समय बिताने का अवसर मिला हुआ है।
          उत्तराखंड से पलायन के जो तीन प्रमुख कारण बताए गए है, मै अपने अनुभवों के आधार पर इन तीन बिंदुओं पर प्रकाश डालना चाहुंगा कि उत्तराखंड के गांवों में शिक्षा, स्वास्थ और रोजगार की स्थिति कैसी है? और गांवों से पलायन में इनकी कितनी भूमिका है। तद्पश्चात उन बिंदुओं पर भी प्रकाश डालने का प्रयास करूंगा जिन कारणों की वजह से पलायन हो रहा है।
1- शिक्षा -अगर शिक्षा व्यवस्था की बात करें तो उत्तराखंड के गांवों में पिछले कुछ सालों में शिक्षा के क्षेत्र में पर्याप्त सुधार हुआ है। अगर प्राथमिक/माध्यमिक शिक्षा की बात करें तों अधिकतर गाँवों में सरकारी विद्यालय हैं। और कुछ दुर्गम क्षेत्र के गांवों को छोड़ दिया जाय तो (इन क्षेत्रों से पलायन कम हुआ है) सभी गांवों के आस-पास प्राइवेट विद्यालय खुले हुए हैं, जो कि इस आँकड़े को झूठा साबित करते हैं कि गाँवों में प्राथमिक षिक्षा की सुविधा नहीं है। और उच्चतम माध्यमिक शिक्षा की स्थिति की बात करें तो हर वर्ष बोर्ड परीक्षा परिणामों में गाँवों के छात्रों को मेरिट सूची में अपना स्थान बनाते हम देखते आए है। उच्च शिक्षा के स्तर की बात करें तो इसकी बहुत अच्छी सुविधा हमारे गांवों में नहीं है। लेकिन गौर करने वाली बात है कि उच्च शिक्षा के लिए बहुत कम लड़के-लड़कियों को बाहर जाते देखा गया हैं।
लेकिन अगर शिक्षा के प्रति जागरूकता की बात करें तो वाकई में गाँव के युवा और अभिभावक शिक्षा के प्रति जागरूक नही हैं, और अपनी कमी का ठीकरा फोड़ा जाता है सुविधाओं पर, कई अभिभावकों की हालत तो यह है कि वे अपने बच्चों को साफ बनाकर और अच्छे से तैयार करके भी विद्यालय नहीं भेजते है, और कुछ माता-पिता अपने बच्चों को सरकारी विद्यालय में बस भात खाने के लिए ही भेजते हैं। किशोरों में भी अपने भविष्य को लेकर चिंता नहीं है। ऐसे में शिक्षा व्यवस्था को दोष देना बेइमानी होगा। इसलिए शिक्षा की वजह से पलायन हो रहा है ऐसा नहीं कहा जा सकता।
2- स्वास्थ - इस बात से इंकार नही किया जा सकता कि उत्तराखंड के गाँवों में स्वास्थ की बहुत अच्छी सुविधाएं नहीं हैं। गंभीर रोगियों के इलाज के लिए यहाँ पर बहुत अच्छी सुविधाएं नही हैं। पर ध्यान देने वाली बात यह है कि स्वास्थ की वजह से पलायन करते हुए मैने बहुत ही कम लोगों को देखा है। महत्वपूर्ण बात यह है कि पहाड़ में रहने वाले लोगों को शहर में रहने वाले लोगों की अपेक्षा कम बीमारियां होती हैं। ब्लडप्रेसर सुगर, मोटापा आदि बीमारियां पहाड़ी लोगों को न के बराबर होती हैं। और देखा जाता है कि पहाड़ के लोग सामान्यतः शहर के लोगों की तुलना में ज्यादा स्वस्थ रहते हैं। हाँ जिसे कोई गंभीर बीमारी हो जाय तो वह गॉव से शहर की ओर भागता है। पर उसका प्रतिशत बहुत कम है। अब आप स्वयं सोचिए कि स्वास्थ सुविधाओं की वजह से कितना पलायन हो रहा होगा?
3- रोजगार- यह बिंदु वाकई में पलायन का एक महत्वपूर्ण कारण है। लेकिन अब सोचनीय विषय यह है कि आप किस तरह के रोजगार के लिए पलायन करते हैं। रोजगार के लिए पलायन करने वालों को भी मै अलग-अलग केटेगरी में शामिल करूंगा।
1- सरकारी और अच्छी जॉब की वजह से बाहर जाने वाले- जो लोग सरकारी जॉब या कोई अन्य अच्छी जॉब पा लेते हैं उनका गाँव छोड़कर जाना स्वाभाविक है। और कई बार ऐसी समस्याएं भी व्यक्ति के सामने आ जाती हैं कि उसे अपने परिवार को साथ में रखना पड़ता है। लेकिन ऐसे लोग यदि रिटायरमेंट के बाद वापस आकर गाँव में कुछ सकारात्मक कार्य करें तो अन्य लोगों में भी उत्साह पैदा होगा।
2- मजबूरी या फिर जिज्ञासा - कुछ लोग देखा-देखी भी शहर की ओर भागते हैं किसी की मजबूरी होती है कि उसे उसकी इच्छा का काम गॉव में नही मिल पाता इसलिए ऐसे कुछ लोग बाहर जाकर अपनी इच्छानुसार कार्य करते हैं। और अपने परिवार के पालन-पोषण के लिए कोई व्यक्ति शहर काम करने जाता है, तो ऐसा नही है कि उसने पलायन कर लिया है। जब तक कि वह परिवार सहित गाँव छोड़कर न चला जाय।
कुछ लोग ऐसे भी होते है जो गॉव के नजदीकी शहरों ( अल्मोड़ा, हल्द्वानी, बागेष्वर)में ही जाकर रोजगार करते हैं। लेकिन ऐसे लोग पलायन किये हुए लोगों में नहीं आते हैं, हॉ अगर कोई सपरिवार गॉव छोड़कर हल्द्वानी, रूद्रपुर जैसे शहरों में ही सैटल हो जाए तो कहा जा सकेगा कि वह परिवार पलायन कर चुका है।
3- आलसी, मूर्ख और अव्यवस्थित- दोस्तो सोचने वाला विषय है कि कुछ लोग केवल 15-20 हजार की नौकरी के लिए गॉव छोड़कर शहर में अपने परिवार के साथ रह रहे हैं। अब सोचने वाली बात है कि शहर की चकाचौंध में एक अच्छी जिन्दगी जीने के लिए इतने पैसे पर्याप्य होते होंगे! जहाँ सारी सुविधाओं के लिए केवल पैसों पर निर्भर रहना पड़ता है। कुछ युवा जो पढने की ही उम्र में शहर निकल लिए, बताते हैं कि वे फैक्ट्रीयों/कम्पनियों में काम करते हैं। और मुझे बड़ी हँसी आती है जब वे बड़े उत्साह से बताते हैं कि उस काम से तो अच्छा गॉव में मजदूरी करना बेहतर है। अब सीधी सी बात है कि अगर वे गांव में मजदूरी भी करें तो जितना वहॉ कमाते है उतना यहॉ भी कमा लेंगे और जिन्दगी वहां से बेहतर। रातों को काम नही करना पड़ेगा। परिवार के साथ सूकून भरी जिन्दगी और साथ में पढ़-लिख भी सकते थे। शहर में 15-20 हजार की जॉब करने वाला व्यक्ति ज्यादा से ज्यादा कितना बचा लेता होगा? इसका अनुमान लगाना ज्यादा कठिन नहीं हैं। लेकिन कुछ न कुछ शायद ऐसा है कि वे मेरी तरह नहीं सोच पा रहें है।
खैर,  अब सोचिए कि क्या उपरोक्त बिंदुओं को आप पलायन के प्रमुख कारणों में रखना चाहेंगें। मै तो बिल्कुल भी न रखूं।
चलिए अब जरा फिर से अपनी पहली लाइन पर आता हुं। गाँवों से षहरों की ओर भागने का फैशन, ऐसा क्या हो रहा है कि लोग शहरों को भागे जा रहे हैं।
                      क्या है हकीकत?
ऐसे कौन से कारण है जिनकी वजह से लोग परिवार के साथ ही शहर को चल दे रहें हैं। कुछ युवक/ युवतियाँ जिज्ञासावस ही शहर की चकाचौध की ओर भागे जा रहें हैं। इनके दिमाग में बहुत ज्यादा बातें नहीं हैं। बस शहर उन्हे आकर्षित करता है। और बाद में उसी माहौल में वे ढल जाते हैं।
गॉव के कई पुरुषों का निकम्मा होना, शराबी होना, महिलाओं पर ही अधिक जिम्मेदारियां होना एक और प्रमुख कारण है। इनकी वजह से गाँव में नई पीढ़ी की लड़कियाँ ऐसी जिन्दगी से छुटकारा चाहती है। और वे शहर की जिन्दगी को बेहतर समझती है। ये सोच अच्छे और बुरे दोनों परिवार की मानसिकता को प्रभावित करती है। अब तो ये एक मानसिकता बन गयी हैं कि लड़की को ऐसे घर में ब्याहना है जो शहर में ही रहें। यह मानसिकता इस कदर हावी है कि अगर लड़का सरकारी जॉब वाला भी है पर गॉव में रहता है तो लड़की ज्यादा इन्ट्रेस्टेड नही होती। और कुछ-एक जगह समझौता हो भी जाता है तो कुछ समय बाद बीबीयॉ कुछ न कुछ तिकड़म भिड़ा कर फुर्र हो लेती हैं पति के साथ। बस हो गया पलायन।  मतलब की कुछ खराब परिवार के माहौल ने अन्य लोगों की मानसिकता को भी प्रभावित कर दिया है।
इसके अलावा कुछ युवक जो होटल/फैक्ट्ररी आदि में काम करने के लिए निकल लेते हैं, अब ये लोग वहां तो जैसे भी जीते हैं पर जब घर आते हैं तो बड़े बनठन कर आते हैं। और अपने बारे में जरा बढ़ा चढ़ा कर भी बताते हैं। और इनको देखकर गॉव के अन्य युवा भी प्रभावित होते हैं साथ ही उनकी पत्नियों को भी उनकी लाइफ मजेदार लगती है, जो उन्हे शहर की ओर आकर्षित करती हैं।
इसके अलावा गाँवों में महिला सास क्या बनी बाघ बन जाती है। सास बनते ही फिर वह अपने ऊपर हुई बन्दीसों की भड़ास अपनी बहु पर निकालती है। इस वजह से भी बहु परेशान  होकर शहर में रहने की फरमाइस अपने पति के सामने रखती है।
एक और सबसे बड़ा कारण कि न जाने क्यों अधिकतर पहाड़ियों को हम पहाड़ी हैं कहने में शर्म जैसी महसूस होती हैं। चार अक्षर पढे़ नहीं कि फिर समाज में पहाड़ी बोलने में भी उन्हे शर्म  महसूस होती है। लड़कों की अपेक्षा लड़कियॉ ज्यादा शर्म महसूस करती हैं। मै तो अक्सर विद्यालय में भी पहाड़ी बोलकर बच्चों को समझाने का प्रयास करता हूँ। और यह इसलिए ताकि उनके मन में अपनी मात्रभूमि और भाषा के प्रति प्रेम बना रहे और बच्चों के मन में अपनी भाषा और क्षेत्र के प्रति हीन भावना उत्पन्न न हो।
पर इस बात को समझने वालों की संख्या बहुत कम है। एक दिन मैने अपनी एक मित्र जो दूसरे विद्यालय में पढ़ाती हैं से इस बारे में बात की। मैने कहा - ‘‘ मैडम पंजाब के लोग पंजाबी में, गुजरात के लोग गुजराती में, बंगाल के लोग बंगाली में तथा अन्य राज्यों के लोग भी जहॉ भी जाते है अपने आपस में अपनी भाषा में ही बात करते हैं। तो हम पहाड़ी ऐसा क्यों नही करते?‘‘
मैने उन्हे सुझाव दिया कि आप विद्यालय स्तर पर पर भी यह किया कीजिए। लेकिन मैडम भड़क गयीं। कहने लगी- ‘‘ जिन भाषाओं की आप बात कर रहें है उनको राष्ट्रीय भाषा का दर्जा दिया गया है, और कुमाऊनी कोई भाषा नहीं है बल्कि एक बोली है, इसलिए इसको प्रयोग करना बिल्कुल गलत है।‘‘ मैडम उल्टा मुझे लैक्चर देने लगी। यही मानसिकता अधिकतर शिक्षित लोगों ( जिन्हें मै शिक्षित नही केवल पढ़े लिखे कहूँगा) की बन चुकी है। तो फिर जब पढ़े लिखे लोग ही अपनी भाषा को दिमाग से डिलीट करने में लगे हुए है तो हो गया न पलायन।

      कई क्षेत्र ऐसे भी हैं जहां बच्चों को हिन्दी समझ नही आती वहां के शिक्षक हिन्दी सिखाने के लिए भी स्थानीय भाषा का प्रयोग करते हैं। एक दिन एक और लड़की के साथ किसी काम से मार्केट में सामान खरीद रहा था। मै दुकानदार से पहाड़ी में ही बात कर रहा था लेकिन साथ में मैडम को यह बात नही जँच रही थीं। दूसरे दिन कहने लगी - ‘‘तुम पढ़ लिख कर भी गँवार ही रहोगे। अगर ये पहाड़ीपन ही दिखाना है तो मुझे बता दिया करो मै नही आऊँगी आपके साथ।" मै क्या बोलता? समझाना बेकार था। पर अफसोस होता है सोचकर कि क्या मानसिकता हो गयी हैं हमारी, जब हम इस तरह की सोच बनाने लगे हैं तो सीधी सी बात है कि हम पहाड़ों को पीछे छोड़ रहें हैं। मै किसी सभ्यता से चिपकने का समर्थक बिल्कुल भी नहीं हुँ लेकिन जिससे कोई हानि न हो अधिक सूकून, शांति और प्रेम मिले वहाँ ठहरने में क्या बुराई है?
        तो दोस्तों संक्षेप में कहूँ तो पलायन का प्रमुख कारण यह है कि हम मानसिक रूप से कमजोर हो चुके है। और अपनी कमियों पर काम करने के बज़ाय हम सुविधाओं आदि को दोष देते है। माना कि शहर की अपेक्षा गाँवों में उतनी सुविधाएं नही है। पर क्या इतने बुरे है हमारे गाँव कि उनकी वजह से हम अपना पहाड़ ही छोड़ दें। गाँवों के पुरुष नशे और शराब के लती हो रहे है। घर की स्त्री बस उनके घरेलू कार्यों की ही वस्तु बनकर रह गई है। पर स्त्रियों की मानसिकता बन गई है कि घर के पुरुष चाहे शराबी, हो उसे मारे, गाली दे, वह उसके लिए भगवान है, युवकों का पढ़ाई और मेहनत की ओर ज्यादा रुझान नही है। शिक्षा के प्रति अभिभावक ज्यादा जागरूक नही है। हमने गाँव में योग कार्यक्रम रखे। और कुछ बुजुर्गों से कहा कि सुबह योगा के लिए आओ तो कहने लगे- अब खौसेर करन योगा। ( अब शमशान में ही होगा योगा) दुकान में चार लोग एक साथ बैठकर ऐसे बाते करते है जैसे संसद् में बैठे हो। पर सुधार हेतु काम कभी नही करते । अब इन सारी चीजों ने एक ऐसा माहौल क्रिएट कर दिया है कि हमें सब बुरा ही नज़र आ रहा है। और हम अपने स्वर्ग जैसे पहाड़ को छोड़कर शहर की भाग रहे हैं।
                               समाधान
   दोस्तो मुझे लगता है कि हमें अब अपनी कमियों पर काम करना होगा। शिक्षा की जितनी पर्याप्य सुविधाएं हमारे यहाँ होनी चाहिए उतनी हैं बस जरूरत है अभिभावकों और युवाओं को शिक्षा के प्रति जागरूक करने की। शिक्षा का मतलब यह नहीं कि पढ़ लिखकर फिर पहाड़ी बोलने में शर्म आए। शिक्षा का मतलब जो अपने समाज के प्रति अपना दायित्य समझे, सुधार हेतु कुछ कार्य करें।
अगर बात करें स्वास्थ की तो स्वास्थ सेवाए बेहतर होने तक, स्वास्थ के प्राकृतिक उपायों- योग, प्राणायाम, व्यायाम आदि के प्रति लोगों को जागरूक किया जाए। नित्य गांवों में योग शिविर लगाए जाए।
और अगर बात करें रोजगार की तो गांवों में बिल्कुल भी रोजगार नहीं हैं ऐसा नहीं हैं। हम अपने सारे काम बाहर से आए लोगों से करवाने लगें हैं। चाहे प्लंबिंग का काम हो या मिस्त्री का काम, पुताई का काम हो या फिर नाई का, या फिर हम लोगों के कपड़े सिलने हों ये सारे कार्य हम पूर्व और बिहार से आए हुए भाईयों से करवा रहे हैं। नजदीकी बाजारों में व्यापारी भी बाहर से आकर व्यापार करने लगें हैं। और हम करते फिर रहें हैं निंदा अपने पहाड़ की। इस का मतलब या तो हम लोगों में ही गुण नहीं है, या फिर हम आलसी हो गए हैं। खेती तो अब हम करने से रहे। सब्जी और अनाज के लिए भी हम अब बाहर के किसान पर निर्भर हो गए हैं। खेती करना बस औपचारिकता भर रह गया है। खेतों में उपज कम इसलिए हो गयी है क्योंकि मेहनत करने के स्थान पर औपचारिकता पूरी की जा रही है। बेहतर होगा अगर हम खेती न करना चाहें तो बाहर से किसानों को बुलाकर उनसे ही यह काम करवा लिया जाय, कम से कम जमीन का सद्उपयोग तो होगा।
इसके अतिरिक्त सास को चाहिए की बहु को भी अपनी बेटी ही समझें। हम अपेक्षा तो रखते हैं कि बहु सास ससुर को अपने माता-पिता की तरह समझें, लेकिन पहले आपको भी उसे अपनी बेटी की तरह समझना होगा।
    पढ़ी लिखी बहुओं को चाहिए कि अपने गॉव में जागरूकता लाए। समस्याओं को मौके की तरह देखें। याद रखें जहॉ समस्या होती हैं अपने को साबित करने का मौका भी वहीं पर होता हैं, कुछ कर दिखाने के मौके को न गवांए।
युवकों को चाहिए जो काम बाहर से आकर लोग कर रहें हैं उन कार्यो में दक्ष बनें। लघु कुटीर उद्योग के द्वारा भी व्यवसाय के अवसर उत्पन्न किए जा सकते है। अगर गहराई से सोचा जाय अपनी क्षमता का कार्य मेहनत से करने पर गाँव में भी पैसे कमाए जा सकते है। बाहर से आए हुए दर्जी, मिस्त्री, नाई और व्यापारी इसका उदाहरण हैं कि काम तो है, बस जरूरत है मेहनत और गुणों की।
     तो दोस्तो उत्तराखंड की वर्तमान स्थिति को दर्शाता यह लेख आपको कैसा लगा जरूर बताएं। इस लेख को लाइक और सेयर करना न भूलें। आप भी अपने विचार व्यक्त करें कि आप इस विषय में क्या सोचते हैं। अगर हम मिलकर विचार करें तो बहुत सारे समाधान सामने आ सकते हैं। सुधार कार्यों हेतु और  की गाँवों की दशा को सुधारने के लिए मुझे आपकी सलाह की आवश्यकता है। अतः मुझे जरूर अपनी सलाह प्रस्तुत करें।
       धन्यवाद
                             आपका मित्र
                             विनोद फल्याँटी
                    सेवा सदन फल्याटी-भैसड़गाँव
   





Comments

  1. १००फीसदी सटीक और मैं पूरी तरह से सहमत हूं

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